क्रिकेट की यादगार तारीख: जब भारत ने 493 रनों का पीछा कर इतिहास को चुनौती दे दी

क्रिकेट के इतिहास में कुछ मुकाबले ऐसे होते हैं, जो जीत-हार से कहीं आगे निकल जाते हैं। 3 फरवरी 1978 का दिन भी ऐसा ही था, जब टीम इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एडिलेड टेस्ट में असंभव को संभव बनाने की लगभग कहानी लिख दी थी।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेली जा रही पांच टेस्ट मैचों की सीरीज 2–2 से बराबर थी। आखिरी टेस्ट सीरीज का फैसला करने वाला था। दबाव बेहद ज्यादा था, लेकिन भारतीय टीम ने जो जज्बा दिखाया, वह आज भी मिसाल माना जाता है।

493 रन का पहाड़ जैसा लक्ष्य

ऑस्ट्रेलिया ने भारत के सामने चौथी पारी में 493 रनों का लक्ष्य रखा। उस दौर में चौथी पारी में 300 रन बनाना भी बहुत मुश्किल माना जाता था। 500 के करीब रन चेज करना तो किसी सपने जैसा था।

एडिलेड की पिच पर ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों को मदद मिल रही थी और ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना था कि मुकाबला पहले ही खत्म हो चुका है। लेकिन भारतीय ड्रेसिंग रूम में सोच बिल्कुल अलग थी—टीम जीत के लिए खेलने उतरी थी, न कि हार से बचने के लिए।

भारतीय बल्लेबाजों की निडर सोच

भारतीय बल्लेबाजों ने शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने गेंदबाजों को सम्मान जरूर दिया, लेकिन डर को खुद से दूर रखा।

जैसे-जैसे रन बनते गए, ऑस्ट्रेलियाई खेमे में बेचैनी बढ़ती गई। जब भारत का स्कोर 4 विकेट पर 323 रन पहुंचा, तो स्टेडियम में मौजूद दर्शक हैरान रह गए। रेडियो पर मैच सुन रहे भारतीय फैंस की धड़कनें तेज हो चुकी थीं।

अब यह सिर्फ एक मैच नहीं रहा था—यह इतिहास बनते देखने जैसा अनुभव था।

अंतिम पलों का रोमांच और दर्द

टीम इंडिया ने पूरी ताकत झोंक दी और स्कोर को 445 रनों तक पहुंचा दिया। यह उस समय टेस्ट क्रिकेट की चौथी पारी का दूसरा सबसे बड़ा स्कोर था।

लेकिन किस्मत ने आखिरी मोड़ पर साथ नहीं दिया। ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी कप्तान बॉब सिम्पसन (41 वर्ष) ने खुद गेंद संभाली और भारत का अंतिम विकेट लेकर मैच खत्म कर दिया। ऑस्ट्रेलिया ने यह मुकाबला जीतकर सीरीज 3–2 से अपने नाम कर ली।

हार जो जीत से कम नहीं थी

भले ही भारत यह मैच हार गया, लेकिन उसने क्रिकेट की सोच बदल दी। इस मुकाबले ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो नामुमकिन लक्ष्य भी डराने लगते हैं।

आज भी यह टेस्ट मैच भारतीय क्रिकेट के सबसे साहसी अध्यायों में गिना जाता है—एक ऐसी हार, जिसने भारत को मानसिक रूप से विजेता बना दिया।